Tara Pratyangira Kavacham | Mahavidya Kavach

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Summary ↬ Tara Pratyangira Kavacham is a potent armor for protection. The Tantra regards Tara as potent as Kali. This is Mahavidya Ugra Tara Pratyangira Kavacham from Rudrayamala tantra and is told by Lord Mahadev to Goddess Parvati.

👉 Vishesh Narayan

📅 Sep 13th, 2021

Tara Pratyangira Kavacham is a potent armor for protection. The Tantra regards Tara as potent as Kali. Tara also figures in Jainism. In Vaishnava lore, Tara was one of the goddesses who fought along with Durga to defeat the thousand-headed Ravana.

She is Tarini, deliverer or savior, one who saves guides, and transports to salvation. Tara is the deity of accomplishments and is often propitiated by business persons for success.

In the group of the Dash Mahavidyas, Tara comes next to Kali. Tara closely resembles Kali in appearance. And just as Kali, Tara too displays gentle (saumya) or fierce (ugra) aspects.

Tara has a much wider presence outside the Mahavidya periphery, especially in the Tantric traditions of both Hinduism and Tibetan Buddhism.

This is Mahavidya Ugra Tara Pratyangira Kavacham from Rudrayamala tantra and is told by Lord Mahadev to Goddess Parvati.

One who wears or recites this powerful armor of Mahavidya Tara becomes victorious everywhere and gets every kind of material comfort. He becomes fearless and gets respected everywhere.

The Kavach removes the negative energies from within and from outside.

Mahavidya Tara Pratyangira Kavacham Text

।। तारा प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् ।।
।। ॐ प्रत्य़ञ्गिरायै नमः ।।
ईश्वर उवाच –
ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।
हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी ।
शक्तयोहष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजितः ।
धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रु निवारिणी ।
ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ।
ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ।
ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् मोहय मोहय ।
ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ।
ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ।
ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् सन्तापय सन्तापय ।
ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् संहारय संहारय ।
ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्व्वपद्भ्यः सर्व्वभूतेभ्यः सर्व्वत्र
रक्ष रक्ष मां स्वाहा ।।
य इमां धारयेत् विध्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।
स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छत्रुन् न संशयः ।
रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।
विध्या प्रत्य़ञ्गिरा ह्येषा सर्व्वतो रक्षयेन्नरं ।।
अनया विध्या रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।
मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।
अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्व्वसिद्ध्यः
ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ।।
इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।
सर्व्वतः सुखमाप्नोति सर्व्वत्रजयमाप्नुयात् ।
नक्कापि भयमाप्नोति सर्व्वत्रसुखमाप्नुयात् ।।

इति रूद्रयामले श्रीमदुग्रताराया प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् समाप्तम् ।

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यह कवच रुद्रयामल तंत्र में वर्णित है और शत्रुओं के निवारण के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इसमें माँ तारा की आठ शक्तियों का वर्णन है जो साधक की सभी ओर से रक्षा करती हैं। यह कवच उन सभी के लिए है जो शत्रुओं से परेशान हैं, किसी मुकदमे में फंसे हैं, या किसी भय से ग्रस्त हैं। यह कवच आत्मरक्षा के लिए है। इसका उपयोग किसी को हानि पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी रक्षा के लिए करना चाहिए।

तारा प्रत्यंगिरा कवच (संस्कृत एवं हिंदी भावार्थ सहित)
॥ अथ तारा प्रत्यङ्गिराकवचम् ॥
॥ ॐ प्रत्यङ्गिरायै नमः ॥
॥ ईश्वर उवाच ॥
 

ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।
हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी ॥ १॥
शक्तयोऽष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजिताः ।
धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रुनिवारिणी ॥ २॥

भावार्थ : माँ तारा की आठ शक्तियाँ हैं - स्तम्भिनी, मोहिनी, क्षोभिनी, हस्तिनी, भ्रामिनी, रौद्री, संहारिणी और तारिणी। ये आठों शक्तियाँ शत्रुओं के नाश के लिए नियोजित की गई हैं। साधक द्वारा धारण किए जाने पर ये सभी शत्रुओं का निवारण करती हैं।
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 अष्ट शक्तियों के मंत्र

श्लोक ३ - स्तम्भिनी मंत्र
ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् स्तम्भय स्तम्भय ॥ ३॥
भावार्थ : हे स्तम्भिनी देवी! मेरे शत्रुओं को स्तम्भित करो, उनकी गति रोको।

श्लोक ४ - क्षोभिनी मंत्र
ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् क्षोभय क्षोभय ॥ ४॥
भावार्थ : हे क्षोभिनी देवी! मेरे शत्रुओं को क्षोभित करो, उन्हें अशांत करो।

श्लोक ५ - मोहिनी मंत्र
ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् मोहय मोहय ॥ ५॥
भावार्थ : हे मोहिनी देवी! मेरे शत्रुओं को मोहित करो, उनकी बुद्धि भ्रमित करो।

श्लोक ६ - जृम्भिनी मंत्र
ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् जृम्भय जृम्भय ॥ ६॥
भावार्थ : हे जृम्भिनी देवी! मेरे शत्रुओं को जृम्भित करो, उन्हें निष्क्रिय करो।

श्लोक ७ - भ्रामिनी मंत्र
ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् भ्रामय भ्रामय ॥ ७॥
भावार्थ : हे भ्रामिनी देवी! मेरे शत्रुओं को भ्रमित करो, उन्हें चक्कर में डालो।

श्लोक ८ - रौद्री मंत्र
ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् सन्तापय सन्तापय ॥ ८॥
भावार्थ : हे रौद्री देवी! मेरे शत्रुओं को संतापित करो, उन्हें तपाओ।

श्लोक ९ - संहारिणी मंत्र
ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रून् संहारय संहारय ॥ ९॥
भावार्थ : हे संहारिणी देवी! मेरे शत्रुओं का संहार करो।

श्लोक १० - तारिणी मंत्र
ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्वपद्भ्यः सर्वभूतेभ्यः सर्वत्र रक्ष रक्ष मां स्वाहा ॥ १०॥
भावार्थ : हे तारिणी देवी! सभी पदों से, सभी भूतों से, सर्वत्र मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। स्वाहा।
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 कवच के लाभ

श्लोक ११-१५
य इमां धारयेत् विद्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।
स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छ्त्रुन् न संशयः ॥ ११॥

भावार्थ : जो इस विद्या को धारण करता है या तीनों संध्या (प्रातः, मध्याह्न, सायं) इसका पाठ करता है, वह सभी दुखों को दूर करके शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है - इसमें कोई संदेह नहीं।

रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।
विद्या प्रत्यङ्गिरा ह्येषा सर्वतो रक्षयेन्नरं ॥ १२॥

भावार्थ : युद्ध में, राजदरबार में, दुर्गम स्थानों पर, महाभय में, विपत्तियों में - यह प्रत्यंगिरा विद्या मनुष्य की सर्वत्र रक्षा करती है।

अनया विद्यया रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।
मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।
अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्वसिद्धयः ॥ १३॥

भावार्थ : इस विद्या से रक्षा करके जो बुद्धिमान पुरुष पाठ करता है, मंत्राक्षरों का ध्यान करता है और नीलसरस्वती का चिंतन करता है, उसकी सभी सिद्धियाँ शीघ्र ही हाथ में हो जाती हैं।

ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ॥
इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।
सर्वतः सुखमाप्नोति सर्वत्र जयमाप्नुयात् ॥ १४॥
न क्कापि भयमाप्नोति सर्वत्र सुखमाप्नुयात् ॥ १५॥

भावार्थ : इस स्तव (कवच) को धारण करने वाला पुरुष नित्य सुख प्राप्त करता है, सर्वत्र विजय प्राप्त करता है, कहीं भी भय प्राप्त नहीं करता और सर्वत्र सुख ही सुख पाता है।

॥ इति रुद्रयामले श्रीमदुग्रताराया प्रत्यङ्गिरा कवचं समाप्तम् ॥

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